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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५३
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उत्तङ्क उवाच
व्रूहि केशव तत्त्वेन त्वमध्यात्ममनिन्दितम् |  १   क
श्रुत्वा श्रेय़ोऽभिधास्यामि शापं वा ते जनार्दन ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति