शान्ति पर्व  अध्याय १३७

पूजन्यु उवाच

स्वय़ं समुपजानन्हि पौरजानपदक्रिय़ाः |  १०४   क
स सुखं मोदते भूप इह लोके परत्र च ||  १०४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति