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शान्ति पर्व
अध्याय १३७
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पूजन्यु उवाच
नित्योद्विग्नाः प्रजा यस्य करभारप्रपीडिताः |  १०५   क
अनर्थैर्विप्रलुप्यन्ते स गच्छति पराभवम् ||  १०५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति