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शान्ति पर्व
अध्याय १३७
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पूजन्यु उवाच
प्रजा यस्य विवर्धन्ते सरसीव महोत्पलम् |  १०६   क
स सर्वय़ज्ञफलभाग्राजा लोके महीय़ते ||  १०६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति