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शल्य पर्व
अध्याय २१
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सञ्जय़ उवाच
पुत्रस्तु ते महाराज रथस्थो रथिनां वरः |  १   क
दुरुत्सहो वभौ युद्धे यथा रुद्रः प्रतापवान् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति