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वन पर्व
अध्याय २६८
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततः सर्वाभिसारेण हरीणां वातरंहसाम् |  २३   क
भेदय़ामास लङ्काय़ाः प्राकारं रघुनन्दनः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति