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द्रोण पर्व
अध्याय १३३
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कृप उवाच
युधिष्ठिरश्च पृथिवीं निर्दहेद्घोरचक्षुषा |  ४२   क
अप्रमेय़वलः शौरिर्येषामर्थे च दंशितः |  ४२   ख
कथं तान्संय़ुगे कर्ण जेतुमुत्सहसे परान् ||  ४२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति