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आदि पर्व
अध्याय २१४
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वैशम्पाय़न उवाच
सुहृज्जनवृतास्तत्र विहृत्य मधुसूदन |  १५   क
साय़ाह्ने पुनरेष्यामो रोचतां ते जनार्दन ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति