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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
एवं पर्याकुले लोके मर्यादा न भविष्यति |  ७२   क
न स्थास्यन्त्युपदेशे च शिष्या विप्रिय़कारिणः ||  ७२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति