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वन पर्व
अध्याय २९९
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वैशम्पाय़न उवाच
और्वेण वसता छन्नमूरौ व्रह्मर्षिणा तदा |  १४   क
यत्कृतं तात लोकेषु तच्च सर्वं श्रुतं त्वय़ा ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति