वन पर्व  अध्याय १९८

व्याध उवाच

स एष जनको राजा दुर्वृत्तमपि चेत्सुतम् |  २८   क
दण्ड्यं दण्डे निक्षिपति तथा न ग्लाति धार्मिकम् ||  २८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति