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शान्ति पर्व
अध्याय १३७
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पूजन्यु उवाच
यस्तु वर्षमविज्ञाय़ क्षेत्रं कृषति मानवः |  ७५   क
हीनं पुरुषकारेण सस्यं नैवाप्नुते पुनः ||  ७५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति