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शान्ति पर्व
अध्याय १३७
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पूजन्यु उवाच
सर्वत्र रमते प्राज्ञः सर्वत्र च विरोचते |  ८३   क
न विभीषय़ते कञ्चिद्भीषितो न विभेति च ||  ८३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति