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शान्ति पर्व
अध्याय १३७
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पूजन्यु उवाच
अधर्मज्ञस्य विलय़ं प्रजा गच्छन्त्यनिग्रहात् |  ९५   क
राजा मूलं त्रिवर्गस्य अप्रमत्तोऽनुपालय़न् ||  ९५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति