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अनुशासन पर्व
अध्याय १३७
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अर्जुन उवाच
सर्वभूतप्रधानांस्तान्भैक्षवृत्तीनहं सदा |  १७   क
आत्मसम्भावितान्विप्रान्स्थापय़ाम्यात्मनो वशे ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति