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अनुशासन पर्व
अध्याय १३७
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अर्जुन उवाच
अद्य व्रह्मोत्तरं लोकं करिष्ये क्षत्रिय़ोत्तरम् |  २०   क
न हि मे संय़ुगे कश्चित्सोढुमुत्सहते वलम् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति