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आदि पर्व
अध्याय १२०
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वैशम्पाय़न उवाच
धनुश्च हि शराश्चास्य कराभ्यां प्रापतन्भुवि |  ९   क
वेपथुश्चास्य तां दृष्ट्वा शरीरे समजाय़त ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति