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अनुशासन पर्व
अध्याय १३७
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अर्जुन उवाच
अथ वा त्वां महीपाल शमय़िष्यन्ति वै द्विजाः |  २३   क
निरसिष्यन्ति वा राष्ट्राद्धतोत्साहं महावलाः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति