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अनुशासन पर्व
अध्याय १३७
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अर्जुन उवाच
वाय़ोर्वा सदृशं किञ्चिद्व्रूहि त्वं व्राह्मणोत्तमम् |  २६   क
अपां वै सदृशं व्रूहि सूर्यस्य नभसोऽपि वा ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति