वन पर्व  अध्याय १३७

लोमश उवाच

स वै प्रविशमानस्तु शूद्रेणान्धेन रक्षिणा |  १८   क
निगृहीतो वलाद्द्वारि सोऽवातिष्ठत पार्थिव ||  १८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति