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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
अभीक्ष्णं क्रूरवादिन्यः परुषा रुदितप्रिय़ाः |  ७७   क
भर्तॄणां वचने चैव न स्थास्यन्ति तदा स्त्रिय़ः ||  ७७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति