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उद्योग पर्व
अध्याय १३७
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द्रोण उवाच
वास एव यथा हि त्वं प्रावृण्वानोऽद्य मन्यसे |  १२   क
स्रजं त्यक्तामिव प्राप्य लोभाद्यौधिष्ठिरीं श्रिय़म् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति