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उद्योग पर्व
अध्याय १३७
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द्रोण उवाच
कुवेरसदनं प्राप्य ततो रत्नान्यवाप्य च |  १५   क
स्फीतमाक्रम्य ते राष्ट्रं राज्यमिच्छन्ति पाण्डवाः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति