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वन पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा प्रशमिते पश्चात्त्वमेष्यसि वनात्पुनः |  १७   क
एवं कृते न ते दोषो भविष्यति विशां पते ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति