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द्रोण पर्व
अध्याय १३७
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सञ्जय़ उवाच
अथैनं पञ्चविंशत्या साय़कानां समार्पय़त् |  १६   क
त्वरमाणस्त्वराकाले पुनश्च दशभिः शरैः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति