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द्रोण पर्व
अध्याय १३७
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सञ्जय़ उवाच
सोमदत्तस्त्वसम्भ्रान्तो दृष्ट्वा केतुं निपातितम् |  १९   क
शैनेय़ं पञ्चविंशत्या साय़कानां समाचिनोत् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति