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द्रोण पर्व
अध्याय १३७
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सञ्जय़ उवाच
न ह्यहत्वा रणे शत्रुं वाह्लीकं कौरवाधमम् |  २   क
निवर्तिष्ये रणात्सूत सत्यमेतद्वचो मम ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति