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द्रोण पर्व
अध्याय १३७
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सञ्जय़ उवाच
सात्वतोऽपि रणे क्रुद्धः सोमदत्तस्य धन्विनः |  २०   क
धनुश्चिच्छेद समरे क्षुरप्रेण शितेन ह ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति