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द्रोण पर्व
अध्याय १३७
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सञ्जय़ उवाच
सोमदत्तं तु सङ्क्रुद्धो रणे विव्याध सात्यकिः |  २३   क
सात्यकिं चेषुजालेन सोमदत्तो अपीडय़त् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति