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द्रोण पर्व
अध्याय १३७
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सञ्जय़ उवाच
ततस्तु सात्वतस्यार्थे भैमसेनिर्नवं दृढम् |  २५   क
मुमोच परिघं घोरं सोमदत्तस्य वक्षसि ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति