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द्रोण पर्व
अध्याय १३७
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सञ्जय़ उवाच
स पपात द्विधा छिन्न आय़सः परिघो महान् |  २७   क
महीधरस्येव महच्छिखरं वज्रदारितम् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति