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भीष्म पर्व
अध्याय ४०
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श्रीभगवानु उवाच
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः |  ४५   क
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति