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द्रोण पर्व
अध्याय १३७
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सञ्जय़ उवाच
तं दृष्ट्वा निहतं तत्र सोमदत्तं महारथाः |  ३४   क
महता शरवर्षेण युय़ुधानमुपाद्रवन् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति