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द्रोण पर्व
अध्याय १३७
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सञ्जय़ उवाच
उपारमस्व युद्धाय़ द्रोणाद्भरतसत्तम |  ४५   क
गृध्यते हि सदा द्रोणो ग्रहणे तव संय़ुगे ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति