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द्रोण पर्व
अध्याय १३७
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सञ्जय़ उवाच
वासुदेववचः श्रुत्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः |  ४८   क
मुहूर्तं चिन्तय़ित्वा तु ततो दारुणमाहवम् ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति