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द्रोण पर्व
अध्याय १३७
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सञ्जय़ उवाच
विमुञ्चञ्शरवर्षाणि पर्जन्य इव वृष्टिमान् |  ६   क
छादय़ामास शैनेय़ं जलदो भास्करं यथा ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति