द्रोण पर्व  अध्याय १३७

सञ्जय़ उवाच

तावन्योन्यं शरैः कृत्तौ व्यराजेतां नरर्षभौ |  ९   क
सुपुष्पौ पुष्पसमय़े पुष्पिताविव किंशुकौ ||  ९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति