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आदि पर्व
अध्याय १३८
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वैशम्पाय़न उवाच
स्नुषां विचित्रवीर्यस्य भार्यां पाण्डोर्महात्मनः |  १७   क
प्रासादशय़नां नित्यं पुण्डरीकान्तरप्रभाम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति