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आदि पर्व
अध्याय १३८
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वैशम्पाय़न उवाच
त्रिषु लोकेषु यद्राज्यं धर्मविद्योऽर्हते नृपः |  २१   क
सोऽय़ं भूमौ परिश्रान्तः शेते प्राकृतवत्कथम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति