आदि पर्व  अध्याय १३८

वैशम्पाय़न उवाच

ज्ञातय़ो यस्य नैव स्युर्विषमाः कुलपांसनाः |  २४   क
स जीवेत्सुसुखं लोके ग्रामे द्रुम इवैकजः ||  २४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति