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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
वाल्ये वृत्तानि सर्वाणि प्रीय़माणौ विचिन्त्य तौ |  २१   क
अन्योन्यं प्रेक्षमाणौ च हसमानौ पुनः पुनः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति