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अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
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युधिष्ठिर उवाच
कन्याय़ां प्राप्तशुल्काय़ां ज्याय़ांश्चेदाव्रजेद्वरः |  २७   क
धर्मकामार्थसम्पन्नो वाच्यमत्रानृतं न वा ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति