आदि पर्व  अध्याय १३८

वैशम्पाय़न उवाच

घोरा समभवत्सन्ध्या दारुणा मृगपक्षिणः |  ७   क
अप्रकाशा दिशः सर्वा वातैरासन्ननार्तवैः ||  ७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति