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शान्ति पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्महति संवृत्ते समरे भृशदारुणे |  ५९   क
वभौ भूमिः प्रतिभय़ा तदा रुधिरकर्दमा ||  ५९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति