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शान्ति पर्व
अध्याय १३८
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भीष्म उवाच
प्रहरिष्यन्प्रिय़ं व्रूय़ात्प्रहृत्यापि प्रिय़ोत्तरम् |  ५४   क
अपि चास्य शिरश्छित्त्वा रुद्याच्छोचेदथापि वा ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति