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शान्ति पर्व
अध्याय १३८
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भीष्म उवाच
मृदुरित्यवमन्यन्ते तीक्ष्ण इत्युद्विजन्ति च |  ६४   क
तीक्ष्णकाले च तीक्ष्णः स्यान्मृदुकाले मृदुर्भवेत् ||  ६४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति