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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २९
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समुद्र उवाच
ततस्तु क्षत्रिय़ाः केचिज्जमदग्निं निहत्य च |  १४   क
विविशुर्गिरिदुर्गाणि मृगाः सिंहार्दिता इव ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति