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शान्ति पर्व
अध्याय १३८
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भीष्म उवाच
इतीदमुक्तं वृजिनाभिसंहितं; न चैतदेवं पुरुषः समाचरेत् |  ६९   क
परप्रय़ुक्तं तु कथं निशामय़े; दतो मय़ोक्तं भवतो हितार्थिना ||  ६९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति