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शान्ति पर्व
अध्याय १४७
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शौनक उवाच
यथा ते मत्कृते क्षेमं लभेरंस्तत्तथा कुरु |  २१   क
प्रतिजानीहि चाद्रोहं व्राह्मणानां नराधिप ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति