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अनुशासन पर्व
अध्याय १०४
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चण्डाल उवाच
तस्माद्धरेन्न विप्रस्वं कदाचिदपि किञ्चन |  ११   क
व्रह्मस्वरजसा ध्वस्तं भुक्त्वा मां पश्य यादृशम् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति